“पैसे दो, बेस हटाओ… तभी रुकेगी जंग!” – ईरान का खुला अल्टीमेटम

हुसैन अफसर
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मिडिल ईस्ट की धरती पर बारूद की गंध और सियासी बयानबाज़ी का धुआँ एक साथ उठ रहा है। ईरान के वरिष्ठ सैन्य नेता मोहसिन रेज़ाई ने साफ कहा है कि जंग खत्म होगी… लेकिन हमारी शर्तों पर।

तेहरान से आया संदेश किसी कूटनीतिक भाषा में नहीं बल्कि सीधे-सीधे अल्टीमेटम जैसा है। पहली शर्त — अमेरिका युद्ध से हुए नुकसान का मुआवज़ा दे। दूसरी — फारस की खाड़ी से अपने सैन्य बेस समेटे।

रेज़ाई का कहना है कि “भविष्य में हमले न होने की 100% गारंटी तभी मिलेगी जब अमेरिकी सैन्य मौजूदगी खत्म होगी।”

“हम झुकेंगे नहीं”: तेहरान का युद्ध संकल्प

भारत में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने भी वही सुर दोहराया। उनका बयान लगभग युद्ध घोष जैसा था।उन्होंने कहा कि यह युद्ध ईरान पर थोपा गया है और देश अपनी गरिमा, स्वतंत्रता और अस्तित्व की रक्षा के लिए खून बहाने को तैयार है।

ईरान का दावा है कि वह इस संघर्ष के अंत तक डटा रहेगा और किसी दबाव में झुकने वाला नहीं।

मिसाइल, ड्रोन और तेल की जंग

इस बीच बहरीन ने दावा किया है कि उसने अब तक 124 मिसाइलें और 203 ड्रोन मार गिराए हैं। दूसरी तरफ यूएई के फुजैराह बंदरगाह पर ड्रोन हमले से तेल टर्मिनल में आग लग गई।

फुजैराह सिर्फ एक बंदरगाह नहीं बल्कि खाड़ी की ऊर्जा राजनीति का बड़ा केंद्र है। यहां से रोज़ लाखों बैरल कच्चे तेल का निर्यात होता है।

यानी युद्ध सिर्फ मिसाइलों का नहीं बल्कि ऊर्जा और अर्थव्यवस्था का भी है।

ट्रंप का पलटवार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के प्रस्तावों को लगभग खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि ईरान हार की स्थिति में डील करना चाहता है, लेकिन ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है जिसे अमेरिका स्वीकार करेगा।

ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि अमेरिका ईरान के सैन्य ढांचे को “लगातार कमजोर” कर रहा है।

यूरोप की बेचैनी और होर्मुज का डर

उधर फ्रांस और इटली ने ईरान से बातचीत शुरू कर दी है ताकि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और गैस की सप्लाई सुरक्षित रह सके।हॉर्मुज दुनिया की सबसे अहम समुद्री लाइफलाइन है। अगर यहां जहाज रुक गए तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में भूचाल आ सकता है।

यूरोपीय देश अब एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा समूह बनाने पर विचार कर रहे हैं जो युद्ध के बाद तेल जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

युद्ध का साया यूरोप तक

मिडिल ईस्ट में चल रही इस लड़ाई का असर यूरोप तक पहुंच गया है। नीदरलैंड के एम्स्टर्डम में एक यहूदी स्कूल पर हमला हुआ जबकि रॉटरडैम में सिनेगॉग के बाहर विस्फोट की घटना सामने आई।

इस हमले की जिम्मेदारी एक नए उग्र संगठन ने ली है जिसने वीडियो जारी कर इसे “प्रतिशोध” बताया।

भारत भी सीधे तौर पर प्रभावित

इस पूरे संकट में भारत भी अछूता नहीं है। होर्मुज के पास कई भारतीय तेल टैंकर फंसे हुए हैं और सैकड़ों भारतीय नाविक जहाजों पर इंतजार कर रहे हैं।

हालांकि ईरान ने दो भारतीय गैस टैंकरों को सुरक्षित रास्ता देने की अनुमति दी है। यह राहत भरी खबर है, लेकिन स्थिति अभी भी बेहद नाजुक बनी हुई है।

दुनिया एक और बड़े संकट के मुहाने पर

मिडिल ईस्ट की राजनीति में हर बयान, हर मिसाइल और हर ड्रोन का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंच रहा है।

तेहरान कह रहा है — “हम नहीं झुकेंगे।”
वॉशिंगटन कह रहा है — “कोई डील नहीं।”

यानी सवाल सिर्फ युद्ध का नहीं, दुनिया की अगली भू-राजनीतिक दिशा का है।

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